Supreme Court ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पास 400 एकड़ हरित क्षेत्र को साफ करने पर रोक लगाई, High court रजिस्ट्रार से रिपोर्ट मांगी
तेलंगाना सरकार द्वारा हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) के पास स्थित कांछा गाचीबावली वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वनस्पति को नष्ट करने का मामला हाल ही में गंभीर रूप से चर्चा में आया है। सरकार ने 400 एकड़ के इस क्षेत्र को समतल करने के लिए भारी मशीनों का उपयोग करना शुरू किया था, ताकि इसे आईटी पार्क के निर्माण के लिए नीलाम किया जा सके। इस कदम के विरोध में UoH के छात्र सड़कों पर उतरे और राज्य सरकार से इस निर्णय को वापस लेने की मांग की।
लेकिन, इस विवाद के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए एक अहम आदेश दिया। पांच दिन बाद जब तेलंगाना सरकार ने कांछा गाचीबावली के वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई शुरू की थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को “चिंताजनक वनों की कटाई गतिविधियों” को तत्काल रोकने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति बी. आर. गवाई और ए. जी. मसिह की बेंच ने आदेश में कहा, “अगले आदेश तक, राज्य द्वारा कोई भी गतिविधि नहीं की जाएगी, सिवाय पहले से मौजूद पेड़ों की सुरक्षा के।”
इस आदेश से एक दिन पहले, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने पेड़ों की कटाई पर गुरुवार तक के लिए रोक लगाने का आदेश दिया था, ताकि राज्य सरकार इस पर पुनर्विचार कर सके। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार को इस मुद्दे पर पूरी तरह से पुनः विचार करना होगा और पर्यावरणीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
तेलंगाना सरकार की कार्रवाई और विरोध
रविवार से ही तेलंगाना सरकार ने भारी मशीनों का इस्तेमाल करते हुए कांछा गाचीबावली क्षेत्र में स्थित हरे-भरे वन क्षेत्र को समतल करना शुरू कर दिया था। यह 400 एकड़ का क्षेत्र न केवल जैविक विविधता से भरपूर था, बल्कि इसमें कई प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव-जंतु भी निवास करते थे। राज्य सरकार का उद्देश्य इस भूमि को आईटी पार्क के निर्माण के लिए नीलाम करना था, जिसे एक विकास परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
हालाँकि, इस कदम को लेकर स्थानीय नागरिकों और विशेष रूप से हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रों में गहरी चिंता और विरोध उत्पन्न हुआ। छात्रों ने इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन किया और सरकार से अपील की कि वह इस भूमि के नीलामी निर्णय को वापस ले। उनका कहना था कि यह कदम न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाएगा, बल्कि शहर की जैव विविधता के लिए भी खतरा बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और पर्यावरणीय चिंता
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश यह दर्शाता है कि जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बात आती है, तो न्यायपालिका को इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना आवश्यक हो जाता है। पर्यावरणीय संगठनों और विशेषज्ञों का मानना है कि बिना उचित पर्यावरणीय आकलन के इस तरह के विकास कार्यों से प्राकृतिक संसाधनों को गंभीर नुकसान हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा कि कोई भी कार्यवाही तब तक न की जाए, जब तक अदालत से अन्य आदेश न मिले। यह आदेश राज्य सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि विकास के नाम पर पर्यावरण की अनदेखी नहीं की जा सकती।