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सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को किया रद्द, कहा मराठा समुदाय को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को किया रद्द, कहा मराठा समुदाय को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता
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मुंबई : पूरे महाराष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने वाले मराठा आरक्षण की अंतिम सुनवाई आज सुप्रीम कोर्ट मे हुई और आरक्षण की लड़ाई लड़ रहा मराठा समाज के हाथ आखिरकार निराशा हाथ लगी है कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय को 50 फीसदी आरक्षण देना असंवैधानिक है।

मराठा आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज सुबह 10.30 बजे शुरू हुई मराठा आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता, न्यायमूर्ति रविंद्र भट और न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर की पीठ ने सुनवाई की और कहा कि 50 फीसदी से अधिक आरक्षण देना राज्य के संविधान के खिलाफ है। इसलिए मराठा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। अदालत ने कहा, "50 फीसदी आरक्षण देना उल्लंघन है।"

मराठा समाज आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों मे नहीं माना जाता है। आरक्षण उन लोगों पर लागू होगा जो पिछड़े समुदाय से हैं। राज्य सरकार ने जल्दबाजी मे आरक्षण का फैसला लिया था लेकिन अब राज्य में कहीं भी ऐसी परिस्थिति नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर फिर से चर्चा नहीं की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर सुनवाई की थी लेकिन अपना फैसला सुरक्षित रखा था। मराठा आरक्षण के तहत राज्य में नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए मराठा कोटा देने का विकल्प है लेकिन अब मराठा आरक्षण का फैसला रद्द कर दिया गया है।

मराठा आरक्षण के फैसले का राज्य और राज्य की राजनीति पर बड़ा असर हो सकता है। पिछले कई वर्षों से इस मुद्दे पर राजनीति चल रही है। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के रोक पर अब महाराष्ट्र की राजनीति मे बड़ा असर देखने मिल सकता है।

महाराष्ट्र में मराठा समाज काफी बड़ी संख्या मे है इसलिए सभी सत्ताधारी दलों से आरक्षण की लगातार मांग की जा रही है। मराठा समाज के लोगों ने इसके लिए कई आंदोलन भी किए जिसके चलते आखिरकार नवंबर 2018 में महाराष्ट्र विधानसभा में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग के लिए अधिनियम 2018 मे पारित किया गया इसके तहत महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान था लेकिन महाराष्ट्र में आरक्षण उच्चतम न्यायालय के 50 प्रतिशत से अधिक हो गया था।

राज्य सरकार ने बाद में मुंबई उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती दी थी। मुंबई उच्च न्यायालय ने बाद में सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया कहा कि राज्य विशेष परिस्थितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे सकता है। उच्च न्यायालय ने बाद में फैसले को सुप्रीम कोर्ट में फैसले को लेकर आव्हान किया था। सितंबर 2020 में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका 2020 से लंबित थी और अब आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला अरद्द कर दिया है।

Updated : 2021-05-05T12:05:35+05:30
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