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भाजपा-कांग्रेस दोनों ही तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों पर क्यों निर्भर हैं?

भाजपा-कांग्रेस दोनों ही तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों पर क्यों निर्भर हैं?
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जिस तरह से यूपी में कभी सपा-बसपा क्षेत्रीय दल हावी था, उसी तरह आज भी तमिलनाडु में पिछले पचास सालों से एआईएडीएमके और डीएमके का दबदबा कायम है। जिसके चलते भाजपा व कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां यहां के क्षेत्रीय दलों निर्भर हैं। यहां 1956 से ही क्षेत्रीय दलों का राजनीति में दखल रहा है। 1967 तक तमिलनाडु में कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन उसके बाद वह सत्ता से बाहर हुई तो अभी तक वापसी नहीं कर सकी। ऐसे में कांग्रेस ने डीएमके के साथ गठबंधन कर रखा है जबकि बीजेपी का एआईडीएमके के साथ चुनाव लड़ने की संभावना बन रही है. ईवी रामास्वामी यानी पेरियार और सीएन अन्नादुरई ने सामाजिक और क्षेत्रीय आंदोलन की शुरूआत की थी. बाद में दोनों लोगों के बीच मतभेद हो गए और पार्टी टूट गई.

अन्नादुरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का गठन किया. डीएमके ने 1956 में राजनीति में प्रवेश किया. साठ के दशक में हिंदी के खिलाफ हुए अंदोलन में डीएमके मजबूत दल के रूप में उभरा. साल 1967 में डीएमके ने तमिलनाडु से कांग्रेस का सफाया कर दिया था. अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने, लेकिन 1967 में उनकी मृत्यु हो गई, जिसके एम करुणानिधि मुख्यमंत्री बने.करुणानिधि को मुख्यमंत्री बने बहुत समय नहीं हुआ था कि साल 1969 में उनके नेतत्व को एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने चुनौती दी. 1972 में डीएमके दो हिस्सों में बंट गई. एमजीआर ने अपने समर्थकों के साथ एआईएडीएमके का गठन किया. 1977 में एमजीआर ने पहली बार चुनाव जीता और 1987 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने तीन बार, 1977, 1980 और 1984 में सरकार बनाई. इसके बाद तमिलनाडु में डीएमके तो कभी एआईएडीएमके सत्ता का स्वाद चखती रही है.

एमजीआर के निधन के बाद एआईडीएमके की कमान जयललिता को मिली और डीएमके के मुखिया करुणानिधि रहे. सुपरस्टार रजनीकांत और अभिनेता कमल हासन ने भी हाल ही में अपनी राजनीतिक पार्टियां बना ली हैं, जिनके इस बार चुनाव लड़ने की संभावना है. तमिलनाडु में पहली बार होगा, जब एआईएडीएमके और डीएमके अपने सबसे प्रभावशाली चेहरे जयललिता और करुणानिधि के बिना विधानसभा चुनाव में उतरेंगे. इन दोनों पार्टियों ने अपने वारिस चुने हैं, करुणानिधि के निधन के बाद डीएमके की कमान उनके बेटे स्टालिन के हाथ में है जबकि जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके के समन्वयक ओ पन्नीरसेल्वम और सीएम के पलानीस्वामी पार्टी के कर्ताधर्ता हैं।

आजादी के बाद कांग्रेस के कामराज जैसे नेता तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. तमिलनाडु में कांग्रेस ने 1967 में सत्ता गंवा दी थी. उसके बाद से प्रदेश में डीएमके या एआईएडीएमके ही सत्ता पर काबिज रहती आई है. कामराज सरकार के बाद कांग्रेस प्रदेश में कभी सत्ता में नहीं आ सकी. कांग्रेस-बीजेपी दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के पास फिलहाल कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे आगे कर वो अकेले दम पर चुनावी मैदान में उतरकर कोई बड़ा करिश्मा दिखा सकें.

Updated : 2020-11-23T15:49:20+05:30
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